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“कर भला तो हो भला”

तौकी़र अहमद (एडवोकेट) लखनऊ

ग़रीबी किसी भी इंसान के लिए एक ऐसी दर्दनाक स्थिति होती है जिससे वह अपनी तमाम बुनियादी आवश्यकताओं जैसे खाना, कपड़ा और मकान जैसी चीज़ो को पाने और अपनी तमन्नाओं को पूरा करने के लिए बेबस और लाचार होता है। ग़रीबी न तो उम्र देखती है न ही धर्म और जाति बस जो भी इसकी चपेट में आ जाता है वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है।

ग़रीबी जहां इंसान को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भीख मांगने से लेकर चोरी, लूट-पाट और अन्य गलत कामों को करने के लिए मजबूर करती है वहीं यह किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो अपने उम्र के आखि़री पड़ाव पर होता है को बोझ उठाने, ठेला लगाने, मज़दूरी करने और रिक्शा चलाने तक को विवश कर देती है।

हम अक्सर तेज़ धूप, बारिश और सर्दी के दिनों में बच्चों, महिलाओं और बूढ़े व्यक्तियों को मज़दूरी करते, बोझ उठाते, ठेला लगाते और रिक्शा खींचते देख सकते हैं, शाय़द इसलिए कि वे अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें और दो जून की रोटी जुटा सकें, इससे आगे की न तो इनकी इच्छाएं होती हैं और न ही सोच।

हमारे देश में ग़रीबी एक बड़ी आम बात है। यहां लोग रूखी सूखी खाने, फटा पुराना पहनने और सड़को के आस पास फुटपाथों और छोटी-छोटी झुग्गियों में जैसे तैसे गुज़र बसर करने को विवश हैं। देश की आबादी के बहुत बड़े हिस्से के पास खा़ने, कपड़े और सर छिपाने के भी लाले पड़े हुए हैं और उनकी यह दयनीय स्थिति उनकी आँखों से साफ झलकती है। कोई भी उन्हें इज़्ज़त नहीं देता है और हर जगह उन्हें तिरस्कृत किया जाता है।

यह समय की विडंबना ही है कि एक ओर इतने अमीर लोग होते हैं कि जिन्हें अपनी आमदनी का भी हिसाब नहीं होता तो वहीं दूसरी ओर इतनी ग़रीबी कि लोग दो जून की रूखी-सूखी रोटी को भी तरस रहे होते हैं। गरीबी के दिन कोई भी इंसान झेलना नहीं चाहता बल्कि हर एक की यही चाहत होती है कि उसे एक राहत और सुकून भरी जिंदगी हासिल हो जिसके लिए अधिकांश लोग मेहनत मज़दूरी करते हैं और कुछ ग़लत रास्ते पर चल पड़ते हैं। मगर चाहत सबकी यही होती है कि ग़रीबी के कारण जिंदगी में आने वाली परेशानियों से मुक्ति मिल सके।

सरकार और अन्य संगठनों द्वारा ग़रीबों की भलाई के तमाम हितकारी काम किये जाते रहते हैं पर ऐसा लगता है कि स्थिति में सुधार आने को ही नहीं। यह हमारा भी दायित्व बनता है कि हम थोड़ा ही सही मगर कुछ तो ग़रीबों का भला सोंचे। क्योंकि यह सच है कि “कर भला तो हो भला”, अगर हम किसी ग़रीब का भला करेंगे, किसी परेशान व्यक्ति की परेशानी में काम आएंगे तो यकीन मानिए कि ईश्वर किसी न किसी रूप में हमारा भला ज़रूर करेगा भले ही हमें इस बात का ज्ञान हो या ना हो।

हम आज अपने घर की शादियों में तमाम ऐसे ख़र्चे करते हैं जो न भी किये जायें तो कोई फर्क नहीं पड़ता पर समाज को दिखाने और अपनी शान-शौकत को बढ़ाने के कारण शायद हम इतना खर्च कर देते हैं कि कभी-कभी कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं या फिर अपना सारा बजट ही हिल जाता है। शादियों में खा़ने की बरबादी इतनी हो जाती है कि इससे कितने भूखों की एक दो वक्त की भूख मिट सकती है। मैं यह नहीं कहता कि शादियों में ख़र्च मत करो या लोगों को मत बुलाओ बस बेकार के ख़र्चों से खुद को बचा कर अगर ईश्वर ने इतना दे ही रखा है तो उस रकम से किसी ग़रीब का भला कर दिया जाए। शादियों में खा़ने की बरबादी से बचा जाए। किसी ग़रीब के ठेले से न चाहते हुए भी कुछ न कुछ ज़रूर ख़रीद लिया जाए ताकि वह अपनी ज़रूरतों को पूरा कर सके।

आज हम होटलों और रेस्तरां में हजारों खर्च कर देते हैं और साथ ही कुछ न कुछ टिप्स भी दे आते हैं मगर ठेलों और फुटपाथों पर सामान बेचने वाले छोटे-छोटे और ग़रीब लोगों से हम इतना मोल भाव करते हैं कि ऐसा लगता है जैसे उनसे बचाए दो चार रुपए में न जाने हम कितने अमीर हो जाएंगे हमें ऐसा नहीं करना चाहिए बल्कि हमें उनका भला सोचना चाहिए। कभी-कभी साइकिल रिक्शा पर भी बैठ कर किसी ग़रीब का भला कर देना चाहिए। किसी बूढ़े, बीमार तथा महिला मज़दूर की मेहनत को हल्का कर देना चाहिए और उनकी मज़दूरी पूरी और समय पर दे देनी चाहिए।

चौराहों पर सामान बेच रहे छोटे-छोटे मासूम बच्चों से न चाहते हुए भी कुछ ले लेना चाहिए। खैर जिस भी तरह से हो हमें ग़रीबों का ख़्याल रखना चाहिए और उनका भी भला सोचना चाहिए क्योंकि उसी ईश्वर ने उन्हें भी पैदा किया जिसने हमें पैदा किया बस फर्क इतना है कि उनकी तकदीर अलग है और हमारी अलग। ईश्वर हम सबको सबका भला चाहने वाला बनाए क्योंकि नियम यही है कि “कर भला तो हो भला”।

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