
फतेहपुर बाराबंकी – मक़ामी हैदरी जामा मस्जिद में 17 रबी उल अव्वल को होने वाला सालाना जश्ने सादिक़ैन मज़हबी जोशो खरोश के साथ बाद नमाज़े मग़रिबैन मुनाक़्क़िद हुआ जिसमें मक़ामी और बैरूनी शोअरा ए कराम ने हज़रत मुहम्मद (सल) और इमाम जाफ़र अल सादिक़ (अ) की शान में नात और मनक़बत पढ़ी। जश्न का अग़ाज़ तिलावते क़ुरआन से हुआ, तिलावत मसरूर महदी महमूदाबादी ने की। तिलावत के बाद मुहम्मद मुज्तबा ने नात मौला मुहम्मद पढ़ी। नात के बाद ग़ुलाम अब्बास, अशर, सिकंदर शिकोह ख़ान, इरफ़ान फतेहपुरी, मसरूर महदी महमूदाबादी, नक़ी ज़ैदपुरी, इशरत ज़ैदपुरी और इफ़्तेखार ज़ैदपुरी ने अपने कलाम पेश किए और पज़ीराई हासिल की। जश्न के आखिर में इमामे जुमा मौलाना सय्यद आरिफ़ हुसैन ने तक़रीर की और सीरत ए नबी पर रौशनी डाली और इत्तेहादुल बैनुल मुस्लिमीन की ज़रुरत और अहमियत बताई। मौलाना ने कहा कि दीने इस्लाम तलवार नहीं बल्कि किरदार के जरिये फैला है। प्यारे नबी (सल) का नाम मुहम्मद उनके चचा हज़रत अबू तालिब (रज़ि) ने रखा था। अहलेबैत की ख़ुशी में ख़ुश होना और अहलेबैत की ग़मी में ग़म मनाना सुन्नते रसूल (सल) है। मौलाना ने मज़ीद कहा कि सुन्नी हज़रात प्यारे नबी (सल) की विलादत 12 रबी उल अव्वल जबकि शिया हज़रात 17 रबी उल अव्वल को मनाते हैं। एक मुसलमान को दूसरे मुसलमान का एहतिराम और मदद करनी चाहिए।
जश्न में बड़ी तादाद में सुन्नी हज़रात ने भी शिरकत की जिसमें तजाम्मुल हुसैन, अलीम अंसारी, हाजी युसूफ अली,सुहैल अंसारी, जलालू, मुन्ना, फ़ैज़ुल अंसारी, जमील सिद्दीकी और महबूब ख़ान मौजूद थे।
शिया हज़रात में हाजी सुलेमान, अर्शी, जमाल महदी, अस्करी हसन, अली हैदर, वल्ले, ज़ैग़म, दानियाल, हुसैन ज़हीर मौजूद थे।


