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सर सैयद अहमद ख़ाँ – आधुनिक शिक्षा और आत्मजागरण के अग्रदूत।

डॉ. मसर्रत अली खान (रजिस्ट्रार) जहांगीराबाद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बाराबंकी

भारत के महान शिक्षाविद, समाज सुधारक और दूरदर्शी विचारक सर सैयद अहमद ख़ाँ (1817–1898) का नाम आधुनिक भारत के निर्माण में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने भारतीय मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक सुधार की अलख जगाई।
17 अक्तूबर 1817 को दिल्ली में जन्मे सर सैयद ने प्रारंभिक शिक्षा अरबी, फ़ारसी और इस्लामी अध्ययन में प्राप्त की, किंतु शीघ्र ही उन्होंने अंग्रेज़ी और आधुनिक विज्ञान की ओर रुझान दिखाया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने भारतीय समाज, विशेषकर मुसलमानों की स्थिति में आए पतन को गहराई से महसूस किया।

इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद’ लिखी, जिसमें विद्रोह के कारणों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया गया। उनका मानना था कि मुसलमानों का पिछड़ापन शिक्षा से दूरी के कारण है। इसी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने 1875 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की, जो आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) बना।

उनकी पत्रिका ‘तहज़ीब-उल-अख़लाक़’ ने मुसलमान समाज में बौद्धिक और सामाजिक जागृति की लहर उत्पन्न की। उन्होंने कुरआन की तार्किक व्याख्या कर धर्म और तर्क का समन्वय प्रस्तुत किया।

सर सैयद का स्पष्ट मत था कि ‘शिक्षा के बिना सम्मान और शक्ति असंभव है। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और आधुनिक भारत में रैशनलिज़्म तथा मॉडर्न इस्लामिक थॉट के प्रवर्तक माने जाते हैं।

27 मार्च 1898 को उनका निधन हुआ, परंतु शिक्षा, सहिष्णुता और मानवता के आदर्शों को साकार करता हुआ उनका सपना आज भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में जीवित है ।

 

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