डॉ. तौसीफ फतेहपुरी की याद में मुशायरा, शायरों ने अपनी बेहतरीन शायरी से बांधा समां।
ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी द्वारा किया गया आयोजन।

फतेहपुर बाराबंकी। कस्बा फतेहपुर में गत रात्रि ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से स्वर्गीय डॉ. तौसीफ फतेहपुरी की याद में एक शानदार मुशायरे का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का संरक्षण राही सिद्दीकी ने किया, जबकि अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर, साहित्यकार और कथाकार रहमान अब्बासी ने की। मुशायरे का संचालन नौजवान शायर अमीर फैसल लखनवी ने अपने खास अंदाज में किया।
कार्यक्रम की शुरुआत हाफिज सलमान राइन द्वारा नात-ए-पाक पेश किए जाने से हुई। अपने अध्यक्षीय संबोधन में रहमान अब्बासी ने कहा कि स्वर्गीय डॉ. तौसीफ फतेहपुरी से उनके पुराने और आत्मीय संबंध रहे हैं। वह बेहद खुशमिजाज, उदार और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे तथा हर किसी से मुस्कुराकर मिलते थे।
आगे उन्होंने कहा कि डॉ. तौसीफ फतेहपुरी के अचानक निधन से उर्दू साहित्य जगत में जो रिक्तता पैदा हुई है, उसकी भरपाई संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की साहित्यिक महफिलें नए और युवा शायरों को मंच प्रदान करती हैं, इसलिए हम सभी की जिम्मेदारी है कि उर्दू अदब की ऐसी महफिलों के आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें।
मुशायरे में शायरों ने अपने-अपने कलाम पेश कर श्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी।
मुशायरे में पढ़े गए अशआर-
रहमान अब्बासी-
किसी ने भी तो मेरी खैरियत नहीं पूछी,
किसी के शाने को कुछ देर मै भिगोता क्या…
राही सिद्दीकी-
एक उंगली की हकीकत मे नही कोई बिसात,
हां मगर पाँच को आपस मे मिलाकर देखो।
वकार काशिफ-
कब तलक दोस्ती निभाते हम,
इतने आँसू कहाँ से लाते हम।
नसीम अख्तर कुरैशी-
कोई अंगुशत नुमाई नही कर सकता है,
जब तलक आबरू महफूज़े मकां होती है।
हस्सान साहिर-
है मुसलमां बावफा खुद बोलेगा दिल आप का,
आँख से चश्मा तास्सुब का हटाकर देखिये।
हसन नईम-
किस बला की थी प्यास की शिद्दत,
देखकर मुझको डर गया पानी।।
ज़ुबैर सीतापुरी-
शाही महल हो दिल्ली का या आगरा का ताज,
ये सारी मिल्कियत मेरे खानदान की है।
रिज़वान जमाली-
अमीर ए शहर अगर बादखिसाल होता है,
तो फिर अवाम का जीना मुहाल होता है।।
ज़ुहूर फैज़ी-
सोचता हूँ कि सारे सितम तोड़ दूँ,
घुट के जीने से बेहतर है दम तोड़ दूँ।
मतीउल्लाह हुसैनी-
नाम ए आमाल तो अपना किसी काबिल नही
हां मगर यह फ़ख्र है उम्मत में हूँ सरकार की।
निशात मंसूरी-
दो नाव का सवार कभी हो सका है पार,
या नेकनाम बनके रहो और या खराब।।
नदीम बेलहरवी-
यूँ तो कहने को है रफीक बहुत,
हर कोई बेवफ़ा नहीं होता।
वसीकुर्रहमान शफक़-
साज़िश रची किसी ने जो हम-तुम जुदा हुये,
तुम बेवफ़ा नहीं हो मुझे एतबार है।।
अमीर फैसल-
लहू आँखों मे आ जाना था लाज़िम
कोई इस दिल से हिजरत कर रहा था।
जावेद कुंवारा-
हाथी जैसा जिस्म लेकर बैठी जब वह सीट पर,
चमचमाती मेरी गाड़ी को खटारा कर दिया।
इस मौके पर पत्रकार रिजवान मुनीर,कफील खां इम्तियाज मालिक,सय्यद अरसलान,सय्याद शाहनवाज मौजूद रहे
समापन पर ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी के फहीम सिद्दीकी और कन्वीनर मुशायरा नौजवान शायर हस्सान साहिर ने सभी शायरों,अतिथियों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।



