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दुआइए कलाम

तौकीर अहमद एड -लखनऊ

 

खा़न-ए-काबा का सफर मुझको करा दे मौला
साथ आका़ (स०) का नगर मुझको दिखा दे मौला

किस क़दर फक्र करेगा यह नसीबा मेरा
सहन-ए-मक्का में अगर मुझको सुला दे मौला

हर घड़ी सब्र-ओ-शुकर में ही गुज़र जाए मेरी
एक ऐसा भी हुनर मुझको सिखा दे मौला

जिस पे चल कर हो मयस्सर मुझे कु़रबत तेरी
बस वही राह गुज़र मुझको दिखा दे मौला

हाथ फैला के बस “तौकी़र” यही मांगे है
रोज़-ए-महशर में ज़बर मुझको बना दे मौला।

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