
मोबाइल और सोशल मीडिया के इस दौर में अक्सर हमें इस प्रकार की खबरें देखने, पढ़ने और सुनने को मिलती हैं कि अल्प आयु के बच्चे जिनकी उम्र मात्र १०-१२ या १५ वर्ष की होती है अनेक प्रकार की अनैतिक और आपराधिक गतिविधियों में शामिल होते जा रहे हैं | कभी किसी बालक द्वारा किसी मासूम बालिका के साथ दुष्कर्म का प्रयास किया जाता है या दुष्कर्म कर भी लिया जाता है तो कभी किसी की हत्या का प्रयास किया जाता है या फिर हत्या को अंजाम भी दे दिया जाता है इनके अतिरिक्त चोरी और लड़ाई झगड़े जैसे न जाने कितने अपराधों में अपनी किशोरावस्था की दहलीज़ पे क़दम रख रहे नौनिहालों का हाथ होता है। जुआ, धूम्रपान और नशे जैसे अनैतिक कार्यों को करने में आज के बच्चे अपनी शान समझते हैं। क्या यह संभव है कि अल्प आयु के बच्चे जिनकी उम्र अभी पढ़ाई और खेल कूद की हो वह इतनी गंभीर और गिरी हुई हरकतों के बारे में सोचें, शायद जवाब यही होगा कि नहीं। मगर समय का चक्र बदल चुका है, युग बदल चुका है, सोच बदल चुकी है। क्या इस ओर समाज के बड़े और समझदार लोगों को और खास कर मां -बाप को ध्यान देने की ज़रुरत नहीं है कि आखिर उनके बच्चों के मन में इस प्रकार की अवधारणाएं कहां से और कैसे पैदा हो रही हैं।
इतनी अल्प आयु में इस प्रकार की सोच पैदा होने का मुख्य कारण शायद मोबाइल और इंटरनेट का अत्यधिक प्रयोग ही हो सकता है। आज के समय में बड़ों और मां-बाप के साथ साथ बच्चे भी मोबाइल के दीवाने हो चुके हैं। एक सर्वे के अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक मां-बाप इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे ज़रुरत से ज़्यादा ऑनलाइन रहते हैं, जिसका नकारात्मक असर उनके बच्चों पर पड़ता है। मां-बाप को इस बात कि शिकायत तो रहती है कि उनके बच्चे मोबाइल, लैपटॉप,अन्य गैजेट्स और इंटरनेट का इस्तेमाल अत्यधिक करते हैं और पढ़ाई या आउटडोर खेलों की ओर कम ध्यान देते हैं, किन्तु इस बात की ओर ध्यान नहीं देते की कहीं बच्चों में यह आदत उन्हीं से तो विकसित नहीं हो रही। यह सच है कि वर्तमान समय में मोबाइल की लत बच्चों पर इस कदर हावी होती जा रही है कि बच्चे इसके लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए बेकरार रहते हैं और वे मोबाइल पर थोड़ी देर नहीं बल्कि सारा सारा दिन और रात में भी लगे रहते हैं। वर्तमान समय में मोबाइल और साइबर एडिक्शन एक गम्भीर समस्या बनती जा रही है जो हमारे साथ साथ हमारे बच्चों की दिनचर्या पर बुरा असर डाल रही है। इससे मानसिक विचलन और चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है, बच्चे अपना मानसिक संतुलन खोते जा रहे हैं, और इसका असर अक्सर घरों में देखने को मिलता है। बच्चों के मिजाज़ में चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ता जा रहा है। बच्चों में मानसिक बिमारियों, आंखों की बिमारियों और अन्य तमाम प्रकार की बिमारियों का विकास हो रहा है जो शायद मोबाइल से पहले के युग में न के बराबर हुआ करता था।
आज मोबाइल में भिन्न भिन्न प्रकार के मारधाड़ वाले गेम खेल कर, गन्दी और अश्लील फिल्में देख कर बच्चे आपराधिक गतिविधियों में घिरते जा रहे हैं। मोबाइल और इंटरनेट पर ज़्यादा समय बिताने से बच्चों में खोज, रचनात्मकता,और समस्याओं के समाधान करने की क्षमता पर असर पड़ता जा रहा है। क्या बच्चों में इस प्रकार के बदलाव के लिए बच्चे स्वयं जिम्मेदार हैं या फिर हम भी, समय रहते इस गंभीर विषय पर ज़रूर सोचना होगा और सचेत होना होगा। नहीं तो आने वाले समय में परिणाम बहुत ही दुखद होंगे।
एक समय वह था जब बच्चे मां-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी या घर के अन्य सदस्यों यहां तक कि पास पड़ोस के लोगों की ममता भरी गोद में कहानियां, कविताएं और लोरी सुनते हुए, भिन्न भिन्न प्रकार के खेल खेलते हुए, अच्छी अच्छी ज्ञानवर्धक और धार्मिक बातें सीखते हुए अपने जीवन की सीढ़ियां चढ़ते थे वही बच्चे आज मोबाइल और इंटरनेट के सहारे अपने जीवन के अहम् सफर की शुरुआत कर रहे हैं। वास्तव में बच्चों का मन बहुत ही कोमल होता है। अपने हर ओर जैसा वे देखते है वैसा ही सीखते हैं और वैसा ही करने का प्रयत्न करते हैं। किताबों से भी इस बात का प्रमाण मिलता है कि मां कि कोख बच्चे का पहला विद्यालय होती है यानी कि बच्चा मां के गर्भ से ही सीखना शुरू कर देता है। एक समय वह था जब गर्भवती महिलाएं अपनी गर्भावस्था के दौरान धार्मिक ग्रंथों का सहारा लेती थीं वहीं आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में जब स्त्री गर्भवती होती है तो अपने कार्यों और व्यक्तिगत रुचि के कारण सर्वाधिक समय जाने अनजाने मोबाइल के साथ ही व्यतीत करती है। और बच्चे के जन्म के बाद तो उस नौनिहाल को बहलाने या अन्य किसी न किसी बहाने से मोबाइल का ही सहारा लिया जाता है। और फिर धीरे-धीरे जब बच्चा बड़ा होने लगता है तब तक उसे मोबाइल की लत लग चुकी होती है। फिर एक समय वह आता है जब बच्चे किशोरावस्था की सीढ़ी पे क़दम रखते हैं और उन्हें अपने चरों तरफ मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया दिख रही होती है और उनके अंदर भी मोबाइल की चाहत पनपने लगती है तब एक दिन वह आ ही जाता है जब वे ज़िद करके या किसी न किसी तरीके से मोबाइल को हासिल कर लेते हैं, फिर कुछ नहीं पता कि वे मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में कितना खो चुके होते हैं। इस बात की न तो मां-बाप को चिंता होती है कि उनके बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल किस लिए कर रहे हैं और न ही घर के किसी अन्य सदस्य को, बस सब अपनी अपनी दुनिया में ही खोए रहते हैं। परिणाम यह देखने को मिलता है कि घर में परिवार के सभी सदस्य मौजूद होते हैं मगर बड़े से लेकर छोटे तक सब अपने अपने मोबाइल में उलझे हुए होते हैं। और घरों में अजीब उदासियों के बादल छाए हुए रहते हैं।
बच्चों के इस प्रकार के मानसिक बदलाव के प्रति यदि हम अभी से सक्रिय न हुए तो वास्तव में बहुत देर हो जाएगी। और जिस प्रकार समाज में आपराधिक गतिविधियां अपना पैर तेज़ी से पसार रही हैं उनपर अंकुश लगाना असंभव हो जाएगा। इस लिए यह समय की आवश्यकता भी है और हर मां-बाप की, परिवार के हर सदस्य की यहां तक कि समाज के हर बड़े और समझदार व्यक्ति की ज़िम्मेदारी भी कि वे अपने और अपने आस पास के बच्चों के साथ समय व्यतीत करें, उनको अच्छे काम सीखने और करने के लिए प्रोत्साहित करें, उनको धार्मिक किताबों का ज्ञान दें , ईश्वर ने हमें क्यों पैदा किया और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है इसके महत्व से उनको अवगत कराएं। जहां तक हो सके उनको मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया से दूर रखें और यदि अति आवश्यक हो तो उनकी गतिविधियों के प्रति सक्रिय रहें। बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल किस लिए और क्यों कर रहें हैं इस बात का पूरा ध्यान रखें। साथ ही उनके मित्रों के विषय में जानने का प्रयास करें कि घर के बाहर उनकी संगत कैसी है। यदि हम कुछ छोटी मगर मोटी बातों पर ध्यान दे लें तो शायद हमारे बच्चे उन सुन्दर फूलों कि तरह नज़र आएंगे जिनसे अपना ही घर आंगन नहीं बल्कि पूरा समाज महकेगा।



