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सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने आ़ला किरदार से कुफ्र-ओ-ज़लालत की तारीकी को नूर-ए-सआ़दत में तब्दील कर दिया –

तौक़ीर अहमद (एडवोकेट) इंदिरा नगर, लखनऊ

 

*रबीउल अव्वल के मुबारक मौके पर एक अहम पैग़ाम “आओ अपना किरदार संवारें”

बात किरदार की है तो क्यों न उस आ़ला शख़्सियत के किरदार की की जाए जिसके आ़ला किरदार को मापने का कोई पैमाना ही मौजूद न हो। और वह आ़ला शख़्सित नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शख़्सित है जिसे रब-ए-कायनात ने भी रहमतुल्लिल्आलमीन के लक़ब से पुकारा।
इस कायनात में हुज़ूर पुरनूर, सरवर-ए-कायनात, ख़ातिमु-न-नबीयीन हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हैसियत उस बेमिसाल आफताब-ए-दरख़्शां की है जो ग़ार-ए-ह़िरा से तुलूअ़ हुआ और तमाम आलम पर छा गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कायनात की वह अज़ीम तरीन शख़्सियत हैं जिसकी मिसाल अज़ल से अबद तक मुमकिन ही नहीं। आप स० बेमिसाल नय्यर-ए-आ़ज़म हैं, जिस तरह सूरज निकलता है तो ज़मीन से अंधेरे को छांट कर हर चीज़ को मुनव्वर कर देता है ठीक उसी तरह आसमान-ए-रूहानियत के नय्यर-ए-आ़ज़म आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने आ़ला किरदार से कुफ्र-ओ-ज़लालत की तारीकी को नूर-ए-सआ़दत में तब्दील कर दिया और उन तमाम अंधेरों से जो इन्सानी ज़हन और क़ल्ब का मरकज़ बने हुए थे उनसे इन्सानियत को निकाल कर रौशन राह पर चलना सिखा दिया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत और आप का आ़ला किरदार तमाम आलम के लिए एक बेमिसाल नमूना बन गए और आप इन्सान-ए-कामिल कहलाए। आप स० की शफ़क़त व मोहब्बत का कोई दायरा न था बल्कि यह तो हर एक के लिए आ़म थी चाहे फिर वह जानदार हों या फिर नबातात। आप स० के इस दुनिया में तशरीफ़ लाने से औरतों, बेवाओं, यतीमों, मिस्कीनों, ग़ुलामों यहां तककि कैदियों को भी वह मक़ाम और वह साया-ए-रहमत हासिल हुआ कि जिसकी मिसाल कयामत तक के लिए मिलना नामुमकिन है। आप स० की सीरत की नरमी का बुलंद पायह मआ’र इतना हसीन था कि इंसान तो इंसान एक बेज़ुबान जानवर भी आपको देखता तो आप पर फिदा हो जाता | आपके आ़ला किरदार से नबातात भी कम फ़ैज़याब न थे, नबातात भी आप की अताअ़त में झुक जाते और आपकी रहमत और शफक़त उसी तरह महसूस करते जैसे कि जानदार।
आप स० अपनी अज़वाज-ए-मुतहरात के साथ भी बराबरी का मामला फरमाते। एक बार आप स० हज़रत सफिया रज़ि० के पास तशरीफ़ ले गए तो देखा कि वह रो रही हैं, आप स० ने रोने कि वजह पूछी, उन्होंने कहा कि आयशा और ज़ैनब कहती हैं कि हम तमाम अज़वाज में अफ़ज़ल हैं इसलिए कि वह आपकी ज़ौजा होने के साथ साथ आपकी चाचा ज़ाद बहन भी हैं। आप स० ने फ़रमाया कि तुमने यह क्यों नहीं कहा कि हारुन मेरे बाप, मूसा मेरे चचा और मोहम्मद स० मेरे शौहर हैं इस लिए तुम लोग क्यों कर मुझ से अफ़ज़ल हो सकती हो। आप स० के अख़लाक़ और सीरत में हमदर्दी और मसावात का जज़्बा था जो किसी को भी कमतर या अफ़ज़ल क़रार देने कि इजाज़त नहीं देता था। यह वाक़िअः इस बात को वाजह करता है कि रसूलल्लाह स० ने अपनी अज़वाज को एक दुसरे के मुक़ाबले में कमतर समझने कि बजाये सबको मसावी और अफ़ज़ल समझने कि तलक़ीन की।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बुलंद पायह सीरत का एतिराफ न सिर्फ आप के मानने वाले ही करते हैं बल्कि ग़ैर भी इस से ख़ाली नहीं। आपका किरदार ही तो था कि कुफ्फार मक्का भी आपको सादिक़ व अमीन कहते थे और अपनी अमानतें आपके सुपुर्द कर देते थे। एक अंग्रेज़ ने अपनी किताब “द हीरोज़” में लिखा है कि मोहम्मद स० दुनिया के किसी भी मैदान में जाते तो वह सबसे अव्वल और आगे होते। अबू सुफियान का वाक़िया है कि इस्लाम लाने से पहले वह आप स० का बदतरीन दुश्मन था मगर जब हब्शा के बादशाह ने उससे पूछा कि मोहम्मद स० लोगों को क्या तालीम देता है और क्या उसने तुम्हारे साथ कभी कोई बद-अहदी या गद्दारी की है तो अबू सुफियान की ज़बान से इसके सिवा कोई अल्फ़ाज़ न निकल सके कि वह बहुत आ़ला मआ’र शख़्सियत है, वह बुत परस्ती से रोकता है और हुस्न-ओ-अक़लाख़ की तालीम देता है और उसने आज तक हमारे साथ कोई बद-अहदी नहीं की।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत के ये वह तमाम पहलू हैं जिनको सिर्फ अपने ही नहीं बल्कि ग़ैर भी तस्लीम करते हैं। मगर बहुत ही अफ़सोसनाक बात है कि हम मुसलमान हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नाम लेवा तो हैं और अगर खुदा न करे कि आप स० की शान में कोई गुस्ताकी करे तो मरने और मारने को भी तैयार रहते हैं मगर हमारी ज़िन्दगियां आप स० की सीरत व सुन्नत से बिल्कुल ख़ाली हैं। इस लिए हमें चाहिए कि दुनिया की चकाचौंध से मुतास्सिर न होकर आप स० के नक्शे कदम पर चलें, आप की सुन्नतों को अपनी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनाएं, आपके किरदार को दुनिया के सामने पेश कर परचम-ए- इस्लाम को सीरत-ए-नबवी की फिज़ा में बुलंद करें। अपनी ज़िंदगी को सीरत-ए-नबवी के नूर से ऐसा मुनव्वर कर लें कि बुराइयों की काली से काली घटाएं भी उस नूर को बोझिल न कर सकें।
रब-ए-कायनात से दुआ है कि हमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत से सच्ची मोहब्बत करने वाला, आप की सुन्नतों पर अमल करने वाला और आप के आ़ला किरदार को दुनिया के सामने पेश करने वाला बनाए। आमीन।।

एक शायर ने क्या खूब कहा है कि:
“अपना किरदार आईना कर लो
सांप शीशे पे चढ़ नहीं सकता”

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