
“दुआ़” वैसे तो दो हर्फ़ का एक छोटा सा लफ़्ज़ है मगर मुझ जैसे कम इल्म को इसकी क़ूवत का अंदाज़ा लगा पाना बहुत ही मुश्किल है! दुआ़ में वह ताक़त होती है जो बन्दे और परवरदिगार के बीच के सभी पर्दों और फासलों को हटा देती है और बन्दा अपने रब से बराह-ए-रास्त मुखा़तिब हो जाता है!
दुआ़ अर्ज़-ए-हाजत है, यानी जब भी हमें कोई हाजत पेश आए तो हम सिर्फ अपने पालनहार की तरफ मुतवज्जह हो कर उसी के सामने अपने ख़ाली दामन को फैला दें क्यों कि हक़ीक़त में वह ही हमारी आरज़ुओं, मुरादों और ज़रूरतों को पूरा करने वाला है! रब-ए-कायनात की शान-ए-इजाबत तो देखिए कि वह दुआ़ करने वालों से ख़ुश होता है और लब्बैक अब्दी फ़रमाता है!
रब-ए-कायनात का इरशाद है :-
* मुझ से दुआ़ करो मैं क़ुबूल करूंगा!
* जब मेरे बन्दे मेरे बारे में आपसे (स०अ०) पूछें तो आप कह दीजिए कि मैं उनके बहुत क़रीब हूं, हर पुकारने वाले की पुकार (दुआ़) को जब भी वो मुझे पुकारें क़ुबूल करता हूं!
* जब पुकारने वाला मुझे पुकारता है तो मै उसकी पुकार को सुन लेता हूं!
दुआ़ की फज़ीलत हदीस-ए-नबवी (स०अ०) की रौशनी में :-
* दुआ़ इबादत का मग्ज़ है!
* क्या मैं तुम्हें वह चीज़ न बताऊं जो तुम्हें तुम्हारे दुश्मन से निजात दे और तुम्हारे रिज्क़ वसीअ़ कर दे लिहाज़ा रात और दिन अल्लाह तआ़ला से दुआ मांगते रहो कि दुआ़ मोमिन का हथियार है! अल्लाह तआ़ला हया वाला, करम वाला है और उससे हया फ़रमाता है कि उस का बन्दा उस की तरफ हाथ उठाए और उन्हें खाली फेर दे बल्कि जो दुआ़ न मांगे अल्लाह तआ़ला उस पर गज़ब फ़रमाता है!
क़ुरआन-ओ-हदीस की रौशनी में दुआ़ की फज़ीलत को देखने के बाद हमें ज़रूरत है अपना जायज़ा लेने की, पहली बात तो यह कि आज हमारे पास हर काम के लिए वक़्त है पर शायद दुआ़ के लिए नहीं क्योंकि हम तमाम इबादतें और भलाई के काम तो कर लेते हैं मगर उसके बाद दुआ़ नहीं करते और इसकी छोटी सी मिसाल हमें मस्ज़िदों में तक़रीबन हर नमाज़ में देखने को मिलती है कि इधर इमाम साहब ने नमाज़ मुकम्मल की और उधर एक एक करके लोग उठने शुरू हुए ऐसा लगता है कि मस्जिद के बाहर कोई बहुत बड़ी नेमत मिलने वाली है और अगर देर हुई तो वे उससे महरूम रह जायेंगे, ऐसे ही रमाज़ान में सहर-ओ-इफ्तार का की़मती वक़्त खाने पीने की तैयारी में चला जाता है, इन्तिहा तो यह है कि हम हज-ओ-उमरा को जाते हैं और वहां जिक्र-ओ-दुआ़ के बजाय फोटोग्राफी कर उसे सोशल मीडिया पर अपडेट करते हैं और शेयर और लाईक का इंतिज़ार कर रहे होते हैं! जबकि हमारा रब हर इबादत और अच्छे काम के बाद दुआओं को ज़रूर क़ुबूल करता है, और इज्तिमाई दुआ़ का फायदा यह है कि किसी एक की दुआ़ क़ुबूल तो सबकी क़ुबूल! दूसरी बात यह कि हमारा अंदाज़-ए-दुआ़ अब वह नहीं रहा जो हमें बतलाया गया है आज हम दुआ़ मांगते नहीं बल्कि बचपन से याद चंद रटी रटाई दुआओं को पढ़ते हैं, हमें दुआ़ पढ़नी नहीं बल्कि मांगनी चाहिए और ऐसे मांगनी चाहिए कि सिर के बालों से लेकर पैर के नाखूनों तक सब भिख़ारी बन जाएं और रब-ए-कायनात को हम पर तरस आ जाए! तीसरी बात यह कि कुछ लोग यह कहते हैं कि दुआ़ क्यों करनी अल्लाह तो हमारी सुनता ही नहीं नऊज़बिल्लाह, तो वो यह जान लें कि
* नबी करीम (स०अ०) से रिवायत है कि बन्दे की दुआ तीन बातों से खाली नहीं होती:-
( 1 ) या उस का गुनाह बख्शा जाता है
( 2 ) या दुनिया में उसे कोई फायदा हासिल होता है
( 3 ) या उस के लिए आख़िरत में भलाई जमा की जाती है, और उस की शान यह होती है कि जब बन्दा अपनी उन दुआओं का अज्र-ओ-सवाब देखेगा जो दुनिया में पूरी न हुई थीं तो तमन्ना करेगा काश दुनिया में मेरी कोई दुआ़ क़ुबूल ही न होती और सब आखि़रत के वास्ते जमा रहतीं!
इसलिए अल्लाह तआ़ला पर यकीन रखते हुए हमेशा दुआ़ मांगते रहें, और याद रखें कि अगर हमारी कोई दुआ़ कुबूल नहीं हुई तो उसमें हमारा कोई बेहतर मुकद्दर है जिसका आख़िरत में बहुत बड़ा अज्र मिलेगा इंशाअल्लाह! और यह भी याद रखिए कि अल्लाह तआ़ला ही हमें सब कुछ देने वाला है उसके सिवा हमें कोई भी कुछ भी नहीं दे सकता हां अल्लाह तआ़ला किसी शख़्स या शय को ज़रिया जरूर बना सकता है! रब-ए-कायनात से दुआ़ है कि मुझे भी अमल करने वाला बना दे, आमीन!!
आखि़र में यही कहूंगा कि :
“इसी थके हुये दस्ते-तलब से मांगते हैं ,
जो मांगते नहीं रब से वो सब से मांगते हैं !!”




