
जौनपुर।
जौनपुर की सरज़मीं ने मंगलवार की शाम एक भावनात्मक और सांस्कृतिक पल का साक्षी बनी, जब अभिनेत्री और रंगमंच कलाकार जूही बब्बर अपने ननिहाल पहुँचीं। यह दौरा केवल एक कलाकार की वापसी नहीं बल्कि परिवार, इतिहास, साहित्य और स्मृतियों से जुड़ाव का जीवंत अनुभव बन गया। जूही ने कहा कि जौनपुर उनके लिए केवल एक शहर नहीं, बल्कि उनकी रूह से जुड़ी वह मिट्टी है जहाँ उनके नाना-नानी की यादें आज भी जीवित हैं।
कलेक्ट्रेट परिसर स्थित प्रेक्षागृह में जूही बब्बर अपने नाना-नानी के जीवन, संघर्ष, विचार और सामाजिक योगदान पर आधारित एकल नाटक प्रस्तुत करेंगी। इस प्रस्तुति की विशेषता यह होगी कि मंच पर सभी पात्रों को जूही स्वयं जीवंत करेंगी। यह नाटक केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास माना जा रहा है।
सज्जाद ज़हीर: साहित्य को बदलाव की आवाज़ देने वाले विचारक
जूही बब्बर के नाना सज्जाद ज़हीर भारतीय साहित्य और प्रगतिशील चिंतन के प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। खेतासराय क्षेत्र के कलापुर गाँव से निकलकर उन्होंने साहित्य को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाया। वर्ष 1932 में प्रकाशित उनकी चर्चित पुस्तक अंगारे ने सामाजिक रूढ़ियों और असमानताओं को चुनौती दी। बाद में 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी रचनाओं में समाज के वंचित वर्गों की पीड़ा और बदलाव की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।
राजिया ज़हीर: शिक्षा और आत्मनिर्भरता की मिसाल
जूही बब्बर की नानी राजिया ज़हीर उस दौर में शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की प्रतीक बनीं, जब महिलाओं की उच्च शिक्षा को लेकर सामाजिक संकोच मौजूद था। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त कर शिक्षण कार्य के माध्यम से समाज में सकारात्मक योगदान दिया। जूही ने कहा कि उनकी नानी ने उस समय साहस और आत्मविश्वास का उदाहरण पेश किया, जब महिलाओं के सपनों को सीमित कर दिया जाता था।
रंगमंच और अभिनय की विरासत को आगे बढ़ा रहीं जूही बब्बर
जूही बब्बर एक प्रतिष्ठित कलात्मक परिवार से आती हैं। उनके पिता राज बब्बर हिंदी सिनेमा के चर्चित अभिनेता और सार्वजनिक जीवन से जुड़े रहे हैं, जबकि उनकी माता नादिरा बब्बर भारतीय रंगमंच की महत्वपूर्ण हस्तियों में शामिल रही हैं। इसी सांस्कृतिक माहौल में पली-बढ़ीं जूही ने अभिनय और रंगमंच में अपनी अलग पहचान बनाई।
कलापुर में भावनाओं से भरा स्वागत
देर शाम जब जूही बब्बर अपने पूर्वजों के गाँव कलापुर पहुँचीं तो ग्रामीणों ने उनका आत्मीय स्वागत किया। उन्होंने गाँव की गलियों में घूमकर पुरानी यादों को महसूस किया और स्थानीय लोगों से मुलाकात की। ग्रामीणों के लिए यह केवल एक प्रसिद्ध अभिनेत्री का आगमन नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत से जुड़ने का अवसर बन गया।
जौनपुर की यह शाम इतिहास, साहित्य, रंगमंच और रिश्तों के ऐसे संगम में बदल गई जिसने यह संदेश दिया कि विचार और विरासत समय के साथ मिटते नहीं, बल्कि पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ते रहते हैं।



