“आज का इंसान भी कितना निराला हो गया,छीन कर हक भाई का अल्लाह वाला हो गया।”
पनिहाल टिकरा मे अब्दुर्रहमान मखदूम शाह (र0अ0) के उर्स पर मुशायरा एवं कवि सम्मेलन आयोजित। समूह संपादक फहीम सिद्दीकी

बाराबंकी। कल रात पनिहाल (टिकरा) मे हज़रत अब्दुर्रहमान मखदूम शाह (र0अ0) के उर्स के मौके पर मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जलाल लखनवी ने तथा संरक्षक की भूमिका मनीष प्रधान ने निभाई।
मुख्य अतिथि के रूप में समाजसेवी दाऊद नेता उपस्थित रहे। हाफिज शकील की तिलावत से महफिल का शुभारंभ हुआ।
मुशायरे में पढ़े गए कुछ अशआर पाठकों की नज़र हैं-
तो क्यों गाली बक रहा है आईने को देखकर,आईने ने तुझको बस सच्चाई ही दिखलाई है।जलाल लखनवी
आज का इंसान भी कितना निराला हो गया,छीन कर हक भाई का अल्लाह वाला हो गया। वकार काशिफ
तेरी तस्वीर बेखुदी में हम चूमते हैं, गले लगाते हैं। सना महमूदाबादी
अपने अपने शौक हैं दुनिया वालों के,हम चिड़ियों के बच्चे पाले बैठे हैं। अल्फाज़ धीरज
चाहती है ये शगुफ्ता तेरा दर रोशन हो,मेरा दिल है कि तेरे हक में दुआ चाहता है। शगुफ्ता अंजुम
हम उससे तर्क-ए-तअल्लुक कभी न कर पाए,इरादा वैसे तो हमने हजार बार किया। हस्सान साहिर
खुद को रब ये कहता है, क्या काना दज्जाल है ये।दानियाल साकिब
आईने की तरह टूट कर मैं बिखर जाऊंगा,तू मुझे छोड़ कर जो गया, रोते-रोते मैं मर जाऊंगा। ज़ैद मजहर
देखता रह गया हर शिकारी उसे,एक परिंदा उड़ा और हवा हो गया। रोमान उल्लाह रोमान
मेरे भाई बस ये गुजारिश है तुमसे,कभी भी हमारा तुम्हारा न करना। अब्बास काशिफ
जो किया वो किए का धरा रह गया,मौत चुपके से आई बुला ले गई। अतीक फतेहपुरी
बिस्तर पर अपने बाप को बीमार देखकर,बच्चे ने बस्ता फेंक के ठेला पकड़ लिया। ज़ुहूर फैज़ी
कहो तो ज़ुल्फ को रुख से हटा दूं, तुम्हारे हाथ में मेहंदी लगी है। डॉ अली मलीहाबादी
इसके अतिरिक्त हिसाम तआकुब, प्रिया सिंह और अबू शहमा ने भी अपना कलाम पेश किया।
मुशायरे में मास्टर सलमान, डॉ अखलाक,सुहैल सितमगर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
अंत में मुशायरे के संयोजक धीरज शर्मा ने सभी शायरों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।



