
रंजना राठौर की कलम से……
देश के लाखों युवा आज सिर्फ नौकरी की तलाश में नहीं हैं, बल्कि अपने सपनों को बचाने की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। एक तरफ बढ़ती महंगाई है, दूसरी तरफ बेरोजगारी का संकट, और इनके बीच प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा वह छात्र है जो अपनी जिंदगी के सबसे कीमती साल एक उम्मीद के सहारे गुजार रहा है।
सुबह से रात तक किताबों में डूबा रहने वाला यह युवा किसी विशेष अधिकार की मांग नहीं करता। वह सिर्फ एक निष्पक्ष अवसर चाहता है। लेकिन जब परीक्षा से पहले या बाद में पेपर लीक की खबरें सामने आती हैं, जब परीक्षा रद्द होती है या परिणामों पर सवाल उठते हैं, तब सबसे बड़ा नुकसान केवल व्यवस्था का नहीं होता, बल्कि उस भरोसे का होता है जिसके सहारे लाखों छात्र आगे बढ़ते हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले छात्र अपनी परिस्थितियों से लड़कर यहां तक पहुंचते हैं। कोई किसान का बेटा है, कोई मजदूर की बेटी। किसी के पिता ने कर्ज लेकर कोचिंग की फीस भरी है तो किसी मां ने अपने गहने बेचकर बच्चे के सपनों को सहारा दिया है। इन परिवारों के लिए प्रतियोगी परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि गरीबी और संघर्ष से बाहर निकलने का रास्ता होती है।
ऐसे में जब मेहनत के सामने अव्यवस्था खड़ी हो जाती है, तब युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है। वे पूछते हैं कि यदि परीक्षा प्रणाली सुरक्षित नहीं है, यदि उनकी वर्षों की तैयारी एक लापरवाही या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ सकती है, तो फिर उनके संघर्ष का मूल्य क्या है?
आज सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक युवाओं की आवाज सुनाई देती है। वे केवल नौकरी नहीं मांग रहे, वे न्याय मांग रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनकी मेहनत का फैसला उनकी योग्यता करे, न कि किसी गड़बड़ी या अनियमितता का साया।
इस बीच सार्वजनिक जीवन में होने वाली बहसें और विवाद भी अक्सर युवाओं का ध्यान खींचते हैं। लेकिन युवाओं की सबसे बड़ी चिंता न तो टीवी स्टूडियो की बहस है और न ही राजनीतिक बयानबाजी। उनकी सबसे बड़ी चिंता उनका भविष्य है। उन्हें इस बात की चिंता है कि वर्षों की तैयारी के बाद भी क्या उन्हें एक निष्पक्ष मौका मिलेगा या नहीं।
यह सच है कि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसके युवा होते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि निराश युवा किसी भी देश के लिए चिंता का विषय होते हैं। जब एक छात्र बार-बार असफल नहीं, बल्कि व्यवस्था से हताश होता है, तब वह केवल अपना भरोसा नहीं खोता, बल्कि समाज की संस्थाओं पर विश्वास भी कमजोर पड़ने लगता है।
आज आवश्यकता है कि युवाओं की पीड़ा को राजनीतिक चश्मे से नहीं, मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए। उनकी मेहनत, उनके संघर्ष और उनके सपनों का सम्मान किया जाए। क्योंकि देश का भविष्य उन हाथों में है जो आज किताबें उठाए बैठे हैं, और उन आंखों में है जो एक बेहतर कल का सपना देख रही हैं।
सवाल अब भी वही है—आखिर उस युवा का दोष क्या है, जिसने अपनी तरफ से मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ी?




